फ्रांस की मदद से समुद्र में मजबूत होगा भारत, चीन की बढ़ी चिंता

भारत और फ्रांस अपने आपसी संबंधों को कूटनीति के नए शिखर पर ले जा रहे हैं। दोनों देशों के बीच 14 करार इसी की पुष्टि करते हैं। इसी के साथ दोनों देशों ने युद्धपोतों के लिए एक दूसरे का नेवल बेस इस्तेमाल करने पर सहमत हुए हैं। छोटे देशों को आर्थिक ट्रैप में लेकर चीन दक्षिण चीन सागर में जिस तरह अपना दबदबा बढ़ा रहा है, उसमें भारत और फ्रांस के बीच हिंद महासागर में ड्रैगन पर नकेल कसने के लिए रणनीतिक साझेदारी को बड़ी पहल के रूप में देखा जा सकता है।

दरअसल, हिंद महासागर में फ्रांस का एक द्वीप है रीयूनियन। यह द्वीप समुद्र में चीन की हरकतों पर नजर रखने के लिए काम आ सकता है। नेवल बेस इस्तेमाल करने की सहमति के बाद भारत फ्रांस के रीयूनियन का इस्तेमाल हिंद प्रशांत समुद्री क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने में कर सकता है। साउथ चाइना सी चीन के दक्षिण में स्थित एक सीमांत सागर है।

ह प्रशांत महासागर का एक भाग है, जो सिंगापुर से लेकर ताइवान की खाड़ी तक लगभग पांच लाख वर्ग किमी में फैला हुआ है। पांच महासागरों के बाद यह विश्व के सबसे बड़े जलक्षेत्रों में से एक है। हिंद और प्रशांत महासागर के बीच एक शिपिंग चैनल स्ट्रैट ऑफ मैल्का है। इस चैनल से भारत का 55 फीसदी से ज्यादा विदेश व्यापार होता है। दुनिया के एक तिहाई व्यापारिक जहाज हर वर्ष इसी चैनल से गुजरते हैं।

यहां से हर साल करीब 5 लाख करोड़ डॉलर का व्यापार होता है। साउथ चाइना सी में ऊर्जा और समुद्री जीवन की प्रचुर संभावनाएं हैं। यहां 11 अरब बैरल तेल और 190 लाख करोड़ घन फुट प्राकृतिक गैस का अनुमानित भंडार है। इसलिए इस पर चीन की गिद्ध नजर है। इसके 80 फीसदी हिस्से पर चीन अपने हक का दावा करता है, जबकि मलेशिया, फिलीपींस, ताइवान, वियतनाम और ब्रुनेई भी इस पर अपना अधिकार जताते हैं।

चीन का तर्क है कि चूंकि इसके नाम में चीन है, इसलिए यह उसका है। यह तर्क बचकाना है। ऐसे में हिंद महासागर भारत का माना जाएगा और मैक्सिको की खाड़ी मैक्सिको की मानी जाएगी। असल में ऐसा नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की संधि के मुताबिक समुद्र जल क्षेत्र पर कोई भी देश न ही अपना हक जता सकता है और न ही अपना आधिपत्य नहीं जमा सकता है। दक्षिण चीन सागर पर अपने दावे को लेकर चीन हेग अंतरराष्ट्रीय अदालत में फिलीपींस से हार चुका है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (अनक्लोस) पर हस्ताक्षर करने के बावजूद चीन दक्षिण चीन सागर मामले में वैश्विक नियमों का पालन नहीं कर रहा है, इसलिए भारत समेत दुनिया के अधिकांश देश साउथ चाइना शी में चीन के दावे को लेकर चिंतित हैं।

चीन की मनमानियों के खिलाफ भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही चार ध्रुवीय अलायंस की पहल पर काम कर रहे हैं। फ्रांस भी इसमें शामिल होने की इच्छा जता चुका है। अब भारत और फ्रांस की साउथ चाइना शी में चीन की दादागिरी के खिलाफ रणनीतिक नौसैन्य साझेदारी हिंद-प्रशांत समुद्री क्षेत्र में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगा।

भारत और फ्रांस रक्षा, तकनीक, शिक्षा, विकास, ट्रेड में मिलकर काम करेंगे और दोनों आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ेंगे। अंतराष्ट्रीय सोलर अलायंस में भी दोनों देश मिलकर नेतृत्व कर रहे हैं और इसमें कर्क रेखा व मकर रेखा के बीच के 121 देश शामिल हैं। इन देशों में सूर्य की पर्याप्त रोशनी रहती है। अंतराष्ट्रीय सोलर अलायंस सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि पीएम मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत और फ्रांस की आपसी साझेदारी को दोनों देशों के विकास व वैश्विक कूटनीति में शिखर पर ले जाएंगे।

Web Title : India will be strong in the sea with the help of France